बीते 50 सालों में पृथ्वी अपनी धुरी पर तेज घूम रही है, एक दिन में इतने सेकंड हुए कम

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बीते 50 सालों में पृथ्वी अपनी धुरी पर तेज घूम रही है, एक दिन में इतने सेकंड हुए कम

कहते हैं समय किसी के लिए नहीं रूकता और तेजी से बढ़ता जाता है. बात अगर बीते साल की करें तो समय काफी तेजी से बीत है. खबरों की मानें तो बीते साल कई दिन ऐसा हुआ है जब पृथ्वी अपने समय से तेजी से घूमी है. डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, पिछली आधी सदी के किसी भी समय की तुलना में साल 2020 में समय तेजी से गुजर है.

पृथ्वी अपनी धूरी पर समय से तेजी से घूम रही है और इसके परिणामस्वरूप दिन की लंबाई 24 घंटे की तुलना में कभी-कभी थोड़ी कम है. एक घंटे में 60 मिनट होते हैं और एक मिनट में 60 सेकेंड होते हैं, इस हिसाब से जोड़े तो 24 घंटे में (86,400) सेकेंड होते हैं और पृथ्वी इतनी ही सेकेंड में अपनी धूरी पर घूमती है. लेकिन बीते साल पृथ्वी ने अपनी धूरी पर इससे कम समय में अपना चक्कर पूरा किया है.

हालांकि, यह समय इतना अधिक नहीं है कि किसी आम इंसान को पता चले. लेकिन, दुनिया के कई शोधकर्ता एटॉमिक क्लॉक के जरिए यह देखते हैं कि आखिर धरती अपनी धूरी पर तेजी से घूम रही है या धीरे, और उन्हें यह समय काफी अधिक लग रहा है.

दुनिया के ऐसे लोग जो एटॉमिक क्लॉक के जरिए समय का हिसाब रखते हैं, इन दिनों उनमें इस बात को लेकर बहस चल रही है कि आखिर क्या इस समय को हटा दिया जाए और उसके बाद वापस उसी समय पर लाया जाए जो पृथ्वी के घूमने का समय है.

बता दें, साल 1970 के बाद से ऐसा कई बार हुआ जब धरती के घूमने की रफ्तार घटी थी. ऐसे में वैज्ञानिकों ने इसका एक तोड़ निकाला और उन्होंने उस समय को जोड़ दिया, ताकि समय का पहिला सही से घूमता रहे. 1970 के बाद ऐसा 27 बार किया जा चुका है. लेकिन इस दौरान ऐसा कभी नहीं हुआ कि समय को हटाया जाए.

बता दें, बीते कुछ दशकों में धरती ने अपनी धूरी पर घूमने के लिए 24 घंटे से अधिक का समय लिया है, लेकिन बीते साल के मध्य के बाद से धरती के घूमने की रफ्तार में तेजी आई है. 19 जुलाई को धरती ने सबसे तेजी से अपना चक्कर पूरा किया था. उस दिन धरती के घूमने की रफ्तार में 1.4602 मिलीसेकेंड की कमी आई थी.

19 जुलाई से पहले साल 2005 में आखिरी बार ऐसा हुआ था. लेकिन साल 2020 में 28 बार धरती ने 86,400 सेकेंड के पूरा होने से पहले ही अपना चक्कर पूरा किया था.

समय का हिसाब रखने वाले शोधकर्ताओं की मानें तो धरती अब औसतन 0.5 सेकेंड जल्दी ही अपनी धूरी पर अपना चक्कर पूरा कर लेती है. समय की यह कमी हमें दिखाई नहीं देती है, लेकिन इसके प्रभाव व्यापक हो सकते हैं. हमारे उपग्रह और संचार उपकरण सोलर टाइम के हिसाब से सेट किए जाते हैं, जो सितारों, चंद्रमा और सूर्य की सही स्थान के आधार पर निर्धारित होते हैं.

इस सामंजस्य को बनाए रखने के लिए पेरिस स्थित इंटरनेशनल अर्थ रोटेशन सर्विस के समयपालों ने पहले कई बार ‘लीप सेकंड्स’ को एक दिन में जोड़ा है. शोधकर्ताओं का मानना है कि धरती पर रह रहे लोगों को समय के साथ सामंजस्य बनाए रखने के लिए इस अतिरिक्त समय को हटाना पड़े.

ऐसे में सवाल होता है कि आखिर ऐसा होता क्यों हैं. इस सवाल का एकदम सटीक जवाब तो किसी को नहीं पता. लेकिन, 2015 के एक अध्ययन में कहा गया है कि पृथ्वी के घूमने में यह बदलाव ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो सकता है. साइंस एडवांस में प्रकाशित एक शोध में दावा किया गया था कि ग्लेशियरों का पिघलना आंशिक रूप से पृथ्वी की धुरी पर तेजी से घूमने के लिए जिम्मेदार है.

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