(राम नाम जान्यो नहीं) Ram Nam Janyo Nahin

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(राम नाम जान्यो नहीं) Ram Nam Janyo Nahin

प्रेम, ध्यान, धर्म, धार्मिकता जैसे अनेक विषयों को ओशो ने इस प्रश्नोत्तर प्रवचनमाला द्वारा अपने अनूठे ढंग से समझाया है। वे कहते हैं, ‘‘और स्मरण रहे कि यह धार्मिकता कोई धारणा नहीं है—यह सत्य की आंतरिक सुवास है।’’

#1: भीतर के राम से पहचान
#2: मैं जीवन सिखाता हूं
#3: प्रेम : समाधि की छाया
#4: मौलिक क्रांति : ध्यान
#5: मैं धर्म नहीं, धार्मिकता ‍दे रहा हूं
#6: मेरा एकमात्र प्रयोजन : तुम जागो
#7: धर्म-अधर्म के पार : कोरा आकाश
#8: जीवन का शंखनाद
#9: अनुशासन नहीं—स्वतंत्रता
#10: मनुष्य बीज है भगवत्ता का

जीवन एक अवसर है। जीवन तथ्य नहीं, केवल एक संभावना है–जैसे बीज, बीज में छिपे हैं हजारों फूल, पर प्रकट नहीं–अप्रकट हैं, प्रच्छन्न हैं। बहुत गहरी खोज करोगे तो पा सकोगे। पा लोगे तो जीवन धन्य हो जाएगा। फूलों की सारी सुगंध फिर तुम्हारी है, और उनके सारे रंग भी, और उनकी कोमलता, और उनका सौंदर्य, और उनसे प्रकट होने वाली परमात्मा की अनुभूति। फूल तो नृत्य हैं अस्तित्व के। फूल तो आकांक्षा हैं पृथ्वी की आकाश के तारों को छू लेने के लिए। लेकिन जो बीज ही रह जाए, वह अभागा है–हुआ भी और न भी हुआ; व्यर्थ ही हुआ। होने और न होने में क्या भेद? अगर बीज ही रह जाना है, तो न भी होते तो भी चल जाता। अंतर तो तब पड़ेगा जब वसंत आएगा। अंतर तो तब पड़ेगा जब फूल हवाओं में और सूरज की किरणों में नाचेंगे। अंतर तो तब पड़ेगा जब मधुमक्खियां और तितलियां उनके पास गीत गाएंगी। उस रास से अंतर पड़ेगा। फूल की बांसुरी पर जब पक्षी अपनी धुन बिठाने लगेंगे, तब बीज को पता चलेगा कि मैं वस्तुतः क्या था। वह नहीं था जो दिखाई पड़ता था; वह था जो कभी दिखाई नहीं पड़ता था। दृश्य नहीं था, अदृश्य था। लेकिन स्मरण रहे कि बीज को तोड़ कर तुम फूल नहीं पा सकते हो। बीज को खंड-खंड करके फूल पाना तो दूर, फूलों की संभावना भी समाप्त हो जाएगी। और तर्क यही करता है–बीज को तोड़ता है, टुकड़े-टुकड़े करता है, इस आशा में…आशा पर संदेह नहीं, मंशा पर संदेह नहीं, भावना बुरी नहीं, मगर भ्रांत है, मूढ़ है, अंधी है। तर्क बीज को तोड़ता है; सोचता है छिपे हैं फूल भीतर, जैसे तिजोड़ियों में खजाने छिपे होते हैं। तोड़ो तिजोड़ी, खजाने मिल जाएंगे। लेकिन फूल यूं नहीं छिपे होते। इसलिए तर्क आदमी में खोजने चलता है, लेकिन परमात्मा को नहीं पाता। आदमी को तोड़ लेता है, हड्डी-मांस-मज्जा पाता है, और कुछ भी नहीं। इससे तो न तोड़ा आदमी ही बेहतर था; कम से कम चमड़ी के भीतर व्यर्थ का कचरा तो छिपा था। तर्क उसको भी उघाड़ देता है। घाव भरते नहीं और मवाद बाहर आ जाती है। फूल तो उगते नहीं; फूल तो दूर, कांटों की संभावना तक असंभव हो जाती है। तर्क इस पृथ्वी पर सबसे अधार्मिक वस्तु है। इसलिए जो लोग धर्म के पक्ष में तर्क देते हैं, उनसे ज्यादा मूढ़ और कोई भी नहीं। विक्षिप्त हैं वे लोग। धर्म की खोज प्रेम की खोज है। प्रेम का रास्ता बिलकुल ही भिन्न है। —ओशो

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