(प्रेम गंगा) Prem Ganga

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(प्रेम गंगा) Prem Ganga

विश्वास और संदेह जीवन के जो परम सत्य हैं, वहां अधैर्य से काम नहीं चलता है। असल में, अधैर्य के कारण ही हम विश्वास कर लेते हैं, या अविश्वास कर लेते हैं। अधैर्य के कारण, वह जो इंपेशेंस है, ऐसा लगता है, अभी, इसी वक्त। तो अभी और इसी वक्त विचार तो नहीं हो सकता है, अंधापन हो सकता है, किसी को भी मान लो।

विचार करना है, तो अत्यंत धैर्य चाहिए। और बड़े आश्चर्य की बात है कि जितना धैर्य हो, उतने जल्दी मनुष्य निर्णय पर पहुंच जाता है। और जितना अधैर्य हो, उतना ही पहुंचना मुश्किल हो जाता है। क्यों? क्योंकि धैर्य की जो क्षमता है, जो शांति है, वह विचार करने के लिए सहारा बनती है। अत्यंत धीरज से भरा हुआ चित्त ठीक से देख पाता है, सोच पाता है, समझ पाता है।
ओशो

Chapter titles:

Chapter 1 विश्वास से मुक्ति और विचार का स्वागत
Chapter 2 अतीत से मुक्ति और नये का स्वागत
Chapter 3 विश्वास और संदेह
Chapter 4 मोक्ष से मुक्ति

विश्वास और संदेह बाहर की चीजों के संबंध में हम दूसरों की सुनी हुई बातों पर भी काम चला लेते हैं, लेकिन भीतर के संबंध में अगर दूसरों की सुनी हुई बातों पर काम चलाने की कोशिश की, तो वह जो भीतर सोया हुआ है, उसके जागने का कभी कोई मौका नहीं आता।
विज्ञान बाहर की खोज है और धर्म भीतर की। इसलिए यह बहुत अजीब सी बात मालूम पड़ेगी कि विज्ञान शास्त्रों पर, परंपराओं पर निर्भर होता है। लेकिन धर्म शास्त्रों और परंपराओं पर निर्भर नहीं होता।

अगर न्यूटन पैदा न हो, तो आइंस्टीन पैदा नहीं हो सकता है। बीच की एक कड़ी अगर न हो, तो आगे की कड़ी विज्ञान में नहीं आएगी। न्यूटन के कंधों पर खड़े हुए बिना आइंस्टीन के जन्म की कोई संभावना नहीं है। लेकिन अगर महावीर न हों, तो बुद्ध के होने में कोई भी बाधा नहीं पड़ती है। और बुद्ध और महावीर दोनों न हों, तो भी रमण के या अरविंद के पैदा होने में कोई बाधा नहीं पड़ती है।

आध्यात्मिक जगत में हम किसी के कंधों पर खड़े नहीं होते, अपने ही पैरों पर खड़े होते हैं। आध्यात्मिक जीवन की कोई परंपरा नहीं है, कोई कड़ियां नहीं हैं, आध्यात्मिक जीवन अदभुत अर्थों में वैयक्तिक जीवन है।

वह जो ‘अध्यात्म’ जिसे हम कहते हैं, वह मूलतः उस दिशा में व्यक्ति परिपूर्ण रूप से स्वतंत्र है। इसलिए कृष्ण ने क्या कहा है, उसे पढ़ लेने से, या मान लेने से, आप स्वयं को नहीं जान लेंगे। हां, अगर आप स्वयं को जान लें, तो कृष्ण ने जो कहा है, उसे जरूर समझने में सफल हो जाएंगे।
शास्त्र से आत्मिक ज्ञान उपलब्ध नहीं होता है, लेकिन आत्मिक ज्ञान उपलब्ध हो, तो शास्त्र सार्थक जरूर हो जाते हैं।
प्रेम के संबंध में मैं कुछ शास्त्र पढ़ लूं, तो पढ़ सकता हूं, लेकिन कोई भी शास्त्र मुझे प्रेम का अनुभव नहीं दे सकता है। और खतरा यह है कि यदि प्रेम के संबंध में बहुत सी बातें मुझे याद हो जाएं, तो यह भ्रांति भी हो सकती है कि मैं प्रेम को जानने लगा हूं। प्रेम को जानने के लिए तो मुझे ही प्रेम से गुजरना पड़ेगा। वह प्रेम का स्वाद और सुगंध मेरे प्रेम से गुजरे बिना नहीं उपलब्ध होने वाली है। प्रेम के संबंध में बहुत कुछ जान लेना भी प्रेम को जानना नहीं है। प्रेम को जानने के लिए व्यक्तिगत अनुभूति अपरिहार्य है, उससे गुजरे बिना कोई रास्ता नहीं है। हां, प्रेम को मैं जान लूं, तो प्रेम के संबंध में कही गई सारी बातों का अर्थ मेरे सामने स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन इससे उलटा नहीं हो सकता।

एक आदमी तैरने के संबंध में सारे शास्त्र पढ़ ले और उन पर विश्वास कर ले और तैरने के संबंध में बहुत बड़ा पंडित हो जाए, तैरने पर प्रवचन दे, तैरने पर थीसिस लिखे, पीएच.डी. करे। लेकिन भूल कर भी उस आदमी को कभी नदी में धक्का मत दे देना; क्योंकि वह आदमी तैरने के संबंध में जानता है, तैरने को नहीं। तैरने के संबंध में जाना हुआ तैरना नहीं बन सकता है। और यह भी हो सकता है कि कोई तैरना जानता हो और उससे आप पूछें कि तैरने के संबंध में कुछ बताओ, तो वह कहे, मैं तैर कर बता सकता हूं। और क्या बताऊं?

जीवन की जितनी गहरी अनुभूतियां हैं, चाहे वे विवेक की हों, चाहे प्रेम की हों, चाहे प्रार्थना की हों, वे गहरी अनुभूतियों के संबंध में किसी दूसरे पर विश्वास करना आत्मघातक है। स्वयं की खोज ही वहां मार्ग है। और मनुष्य की जो अंतरात्मा है, उसकी जो मौलिक प्रतिभा है, उसका आविष्कार करना हो, तो जितने दूर तक बन सके, जितने गहरे तक बन सके, उतना अपने पर ही निर्भर होना उचित है। स्व-निर्भरता ही अंततः आत्मा में प्रवेश का द्वार बनती है। पर-निर्भरता अंततः परावलंबन और दूसरे के आश्रय में गुलामी बन जाती है, परतंत्रता बन जाती है। पर-निर्भरता परतंत्रता का सूत्र है, स्व-निर्भरता स्वतंत्रता का सूत्र है।

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