(पिव पिव लागी प्यास) Piv Piv Lagi Pyas

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(पिव पिव लागी प्यास) Piv Piv Lagi Pyas

“मन चित चातक ज्यूं रटै, पिव पिव लागी प्यास।

नदी बह रही है, तुम प्यासे खड़े हो; झुको, अंजुली बनाओ हाथ की, तो तुम्हारी प्यास बुझ सकती है। लेकिन तुम अकड़े ही खड़े रहो, जैसे तुम्हारी रीढ़ को लकवा मार गया हो, तो नदी बहती रहेगी तुम्हारे पास और तुम प्यासे खड़े रहोगे। हाथ भर की ही दूरी थी, जरा से झुकते कि सब पा लेते। लेकिन उतने झुकने को तुम राजी न हुए। और नदी के पास छलांग मार कर तुम्हारी अंजुली में आ जाने का कोई उपाय नहीं है। और आ भी जाए, अगर अंजुली बंधी न हो, तो भी आने से कोई सार न होगा।

शिष्यत्व का अर्थ है: झुकने की तैयारी। दीक्षा का अर्थ है: अब मैं झुका ही रहूंगा। वह एक स्थायी भाव है। ऐसा नहीं है कि तुम कभी झुके और कभी नहीं झुके। शिष्यत्व का अर्थ है, अब मैं झुका ही रहूंगा; अब तुम्हारी मर्जी। जब चाहो बरसना, तुम मुझे गैर-झुका न पाओगे।”—ओशो

पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:
भक्ति की राह में श्रद्धा की अनिवार्यता
प्रेम समस्या क्यों बन गया है?
धर्म और नीति का भेद
समर्पण का अर्थ
शब्द से निःशब्द की ओर

अनुक्रम
प्रवचन 1: गैब मांहि गुरुदेव मिल्या
प्रवचन 2: जिज्ञासा-पूर्ति: एक
प्रवचन 3: राम-नाम निज औषधि
प्रवचन 4: जिज्ञासा-पूर्ति: दो
प्रवचन 5: सबदै ही सब उपजै
प्रवचन 6: जिज्ञासा-पूर्ति: तीन
प्रवचन 7: ल्यौ लागी तब जाणिए
प्रवचन 8: जिज्ञासा-पूर्ति: चार
प्रवचन 9: मन चित चातक ज्यूं रटै
प्रवचन 10: जिज्ञासा-पूर्ति: पांच

उद्धरण : पिव पिव लागी प्यास – पहला प्रवचन – गैब मांहि गुरुदेव मिल्या

“गुरु भी जो देता है, वह प्रसाद है। उसके पास बहुत है। उसे परमात्मा मिल गया है। वह बांटना चाहता है। वस्तुतः वह बोझिल है। जैसे बादल पानी से भरे हों और बोझिल हैं। और चाहते हैं कि कोई भूमि मिल जाए, जहां बरस जाएं। कोई अतृप्त, प्यासी भूमि मिल जाए, जो उन्हें स्वीकार कर ले। जैसे दीया जलता है, तो चारों तरफ रोशनी बिखरनी शुरू हो जाती है–बंटना शुरू हो गया। फूल सुगंधित होता है, कली खिलती है, हवाएं उसकी गंध को लेकर दूर दिगंत में निकल जाती हैं–बांटना शुरू हो गया।

जब भी तुम्हारे पास कुछ होता है, तो तुम बांटना चाहते हो। सिर्फ वे ही पकड़ते हैं और कंजूस होते हैं, जिनके पास कुछ भी नहीं है। इसे भी तुम ठीक से समझ लो। क्योंकि यह बात थोड़ी पहेली सी मालूम पड़ेगी।

मैं कहता हूं, जिनके पास कुछ भी नहीं है, वे ही केवल पकड़ते हैं और कंजूस होते हैं। और जिनके पास कुछ है, वे कभी कृपण नहीं होते और कभी नहीं पकड़ते। क्योंकि जिनके पास कुछ है, वे यह भी जानते हैं कि बांटने से बढ़ता है। जिनके पास कुछ नहीं है, वे डरते हैं क्योंकि बांटने से घटेगा।

गुरु तुम्हें देता है इसलिए नहीं कि तुमने साधना से, श्रम से योग्यता पा ली है, नहीं, गुरु तुम्हें देता है क्योंकि तुम्हारी आंखों में आंसू हैं। गुरु तुम्हें देता है क्योंकि तुम्हारे हृदय में प्यास है। गुरु तुम्हें देता है क्योंकि तुम्हारी श्वास-श्वास में एक खोज है। बस, इतना काफी है। तुम पात्र हो क्योंकि तुम खाली हो। पात्रता के कारण तुम पात्र नहीं हो।

यह पात्र शब्द बड़ा अच्छा है। उसी से पात्रता शब्द बनता है। पात्रता से हम अर्थ लेते हैं, योग्यता; लेकिन अगर ठीक से समझो तो पात्र का इतना ही मतलब होता है, जो खाली है, जो भरने को राजी है। कोई अगर भरे, तो वह बाधा न डालेगा। बस, पात्र का इतना ही अर्थ होता है। धर्म के जगत में इतनी ही पात्रता है कि तुम खाली हृदय को लेकर खड़े हो जाओ; गुरु का प्रसाद तुम्हें भर देगा।
…पाया हम परसाद। मस्तक मेरे कर धर्‌या देखा अगम अगाध।”—ओशो

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