(मरौ हे जोगी मरौ) Maro He Jogi Maro

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(मरौ हे जोगी मरौ) Maro He Jogi Maro

ओशो कहते हैं : ‘‘भारत की सारी संत-परंपरा गोरख की ॠणी है…. गोरख ने जितना आविष्कार किया मनुष्य के भीतर अंतर-खोज के लिए, उतना शायद किसी ने नहीं किया है। इतने द्वार तोड़े मनुष्य के अंतरतम में जाने के लिए, कि लोग द्वारों में उलझ गये। तभी गोरखधंधा शब्द प्रचलन में आया।’’ लेकिन गोरख-विद्या को गोरखधंधे में बदलने का काम भी तो हमारा ही है, नहीं तो सीधे-सीधे शब्द, सीधी-साधी विधियां हमारी समझ से बाहर क्यों हों? जैसे कि : ‘हबकि न बोलिबा, ठबकि न चलिबा, धीरे धरिबा पांव’—यह है अहंकार के आवरण को तोड़ने की कला। ‘मन में रहिणा, भेद न कहिणा, बोलिबा अमृत वाणी’—स्वयं में स्थित होने के लिए ज़ुबान का कायदा। ‘मारिलै मन द्रोही’—मन पर अंकुश लगाने की कला। और अंत में ‘सबद भया उजियाला’—जिस दिन अंतरात्मा का प्रवेश हुआ, उसी दिन उजियाला। बस उसी उजियाले की तलाश पर हमें ओशो ले चलते हैं इस गोरख-वाणी के द्वारा।

#1: हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानं
#2: अज्ञात की पुकार
#3: सहजै रहिबा
#4: अदेखि देखिबा
#5: मन मैं रहिणा
#6: साधना : समझ का प्रतिफल
#7: एकांत में रमो
#8: आओ चांदनी को बिछाएं, ओढ़ें
#9: सुधि-बुधि का विचार
#10: ध्यान का सुगमतम उपाय : संगीत
#11: खोल मन के नयन देखो
#12: इहि पस्सिको
#13: मारिलै रे मन द्रोही
#14: एक नया आकाश चाहिए
#15: सिधां माखण खाया
#16: नयन मधुकर आज मेरे
#17: सबद भया उजियाला
#18: उमड़ कर आ गए बादल
#19: उनमनि रहिबा
#20: सरल, तुम अनजान आए

महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने मुझसे एक बार पूछा कि भारत के धर्माकाश में वे कौन बारह लोग हैं–मेरी दृष्टि में–जो सबसे चमकते हुए सितारे हैं? मैंने उन्हें यह सूची दी: कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, शंकर, गोरख, कबीर, नानक, मीरा, रामकृष्ण, कृष्णमूर्ति। सुमित्रानंदन पंत ने आंखें बंद कर लीं, सोच में पड़ गये…। सूची बनानी आसान भी नहीं है, क्योंकि भारत का आकाश बड़े नक्षत्रों से भरा है! किसे छोड़ो, किसे गिनो?…वे प्यारे व्यक्ति थे–अति कोमल, अति माधुर्यपूर्ण, स्त्रैण…। वृद्धावस्था तक भी उनके चेहरे पर वैसी ही ताजगी बनी रही जैसी बनी रहनी चाहिए। वे सुंदर से सुंदरतर होते गये थे…।

मैं उनके चेहरे पर आते-जाते भाव पढ़ने लगा। उन्हें अड़चन भी हुई थी। कुछ नाम, जो स्वभावतः होने चाहिए थे, नहीं थे। राम का नाम नहीं था! उन्होंने आंख खोली और मुझसे कहा: राम का नाम छोड़ दिया है आपने! मैंने कहा: मुझे बारह की ही सुविधा हो चुनने की, तो बहुत नाम छोड़ने पड़े। फिर मैंने बारह नाम ऐसे चुने हैं जिनकी कुछ मौलिक देन है। राम की कोई मौलिक देन नहीं है, कृष्ण की मौलिक देन है। इसलिये हिंदुओं ने भी उन्हें पूर्णावतार नहीं कहा। उन्होंने फिर मुझसे पूछा: तो फिर ऐसा करें, सात नाम मुझे दें। अब बात और कठिन हो गयी थी। मैंने उन्हें सात नाम दिये: कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, शंकर, गोरख, कबीर। उन्होंने कहा: आपने जो पांच छोड़े, अब किस आधार पर छोड़े हैं? मैंने कहा: नागार्जुन बुद्ध में समाहित हैं।

जो बुद्ध में बीज-रूप था, उसी को नागार्जुन ने प्रगट किया है। नागार्जुन छोड़े जा सकते हैं। और जब बचाने की बात हो तो वृक्ष छोड़े जा सकते हैं, बीज नहीं छोड़े जा सकते। क्योंकि बीजों से फिर वृक्ष हो जायेंगे, नये वृक्ष हो जायेंगे। जहां बुद्ध पैदा होंगे वहां सैकड़ों नागार्जुन पैदा हो जायेंगे, लेकिन कोई नागार्जुन बुद्ध को पैदा नहीं कर सकता। बुद्ध तो गंगोत्री हैं, नागार्जुन तो फिर गंगा के रास्ते पर आये हुए एक तीर्थस्थल हैं–प्यारे! मगर अगर छोड़ना हो तो तीर्थस्थल छोड़े जा सकते हैं, गंगोत्री नहीं छोड़ी जा सकती। ऐसे ही कृष्णमूर्ति भी बुद्ध में समा जाते हैं। कृष्णमूर्ति बुद्ध का नवीनतम संस्करण हैं–नूतनतम; आज की भाषा में। पर भाषा का ही भेद है। बुद्ध का जो परम सूत्र था–अप्प दीपो भव–कृष्णमूर्ति बस उसकी ही व्याख्या हैं। एक सूत्र की व्याख्या–गहन, गंभीर, अति विस्तीर्ण, अति महत्वपूर्ण! पर अपने दीपक स्वयं बनो, अप्प दीपो भव–इसकी ही व्याख्या हैं। यह बुद्ध का अंतिम वचन था इस पृथ्वी पर। शरीर छोड़ने के पहले यह उन्होंने सार-सूत्र कहा था। जैसे सारे जीवन की संपदा को, सारे जीवन के अनुभव को इस एक छोटे-से सूत्र में समाहित कर दिया था। —ओशो

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