(कैवल्य उपनिषद) Kaivalya Upanishad

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(कैवल्य उपनिषद) Kaivalya Upanishad

“सम्मोहन को हिंदू शास्त्रों ने माया कहा है। हम जो भी कर रहे हैं, जो भी हैं, जो भी हमारी चित्तदशा है, वह सब हमारा सम्मोहन है। आप सुखी हैं, दुखी हैं, वह आपका सम्मोहन है। लेकिन आपको पता भी नहीं है, इसलिए बदलाहट बड़ी मुश्किल पड़ती है। बड़ी मुश्किल पड़ती है बदलाहट करना। अगर आप दुखी हैं और किसी से कहो कि यह तुम्हारा सम्मोहन है कि तुम दुखी हो, तो वह मानने को राजी नहीं होगा, क्योंकि बदल नहीं सकता। लेकिन सम्मोहन के आप प्रयोग करें तो आप चकित ही हो जाएंगे। एक व्यक्ति को सम्मोहित करके लिटा दें, फिर उसको प्याज का टुकड़ा दे दें और कह दें कि यह सेब है, वह खाएगा और कहेगा सेब है। फिर आप उसके मुंह में मिट्टी डाल दें और कहें कि यह मिठाई है और वह मिठाई की तरह ही भाव पैदा करेगा चेहरे पर। स्वाद लेगा, आनंदित होगा और कहेगा बहुत मीठा है… ‘–ओशो

ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत ओशो द्वारा कैवल्य उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह प्रवचन

उद्धरण: कैवल्य उपनिषद, पहला प्रवचन
कैवल्य उपनिषद एक आकांक्षा है, परम स्वतंत्रता की। कैवल्य का अर्थ है: ऐसा क्षण आ जाए चेतना में, जब मैं पूर्णतया अकेला रह जाऊं, लेकिन मुझे अकेलापन न लगे। एकाकी हो जाऊं, फिर भी मुझे दूसरे की अनुपस्थिति पता न चले। अकेला ही बचूं, तो भी ऐसा पूर्ण हो जाऊं कि दूसरा मुझे पूरा करे, इसकी पीड़ा न रहे। कैवल्य का अर्थ है: केवल मात्र मैं ही रह जाऊं। लेकिन इस भांति हो जाऊं कि मेरे होने में ही सब समा जाए। मेरा होना ही पूर्ण हो जाए। अभीप्सा है यह मनुष्य की, गहनतम प्राणों में छिपी। सारा दुख सीमाओं का दुख है। सारा दुख बंधन का दुख है। सारा दुख–मैं पूरा नहीं हूं, अधूरा हूं। और मुझे पूरा होने के लिए न मालूम कितनी-कितनी चीजों की जरूरत है। और सब चीजें मिल जाती हैं तो भी मैं पूरा नहीं हो पाता हूं; मेरा अधूरापन कायम रहता है। सब-कुछ मिल जाए, तो भी मैं अधूरा ही रह जाता हूं। तो एक आकांक्षा मनुष्य के भीतर जगी, जिसे हम धर्म कहते हैं, कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि मैं जिन चीजों को पाने चलता हूं, उनको पा लेने पर भी जब पूर्णता नहीं मिलती है तो उन्हें पाने की यात्रा ही व्यर्थ और गलत हो। तो फिर कोई और मार्ग खोजा जाए, जहां मैं वस्तुओं को पाकर पूरा नहीं होता, बल्कि मैं ही पूरा हो जाता हूं। और तब किसी वस्तु की कोई जरूरत नहीं रह जाती। इसलिए जिन्होंने भी गहन खोज की है उन्हें लगा कि आदमी तब तक आनंद को न पा सकेगा, जब तक कोई भी जरूरत किसी और पर निर्भर है। जब तक दूसरा जरूरी है, तब तक दुख रहेगा। जब तक मेरा सुख दूसरे पर निर्भर है, तब तक मैं दुखी रहूंगा। जब तक मैं किसी भी कारण दूसरे पर निर्भर हूं, तब तक मैं परतंत्र हूं और परतंत्रता में आनंद नहीं हो सकता। अगर हम सारे दुखों का निचोड़ निकालें तो पाएंगे, परतंत्रता। और सारे आनंद का सारफूल जो है, वह है स्वतंत्रता। इस परम स्वतंत्रता को हमने मोक्ष कहा है। इस परम स्वतंत्रता को हमने निर्वाण कहा है। और इसी परम स्वतंत्रता को हमने कैवल्य कहा है। —ओशो

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