(ज्यूं था त्यूं ठहराया) Jyun Tha Tyun Thaharaya

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(ज्यूं था त्यूं ठहराया) Jyun Tha Tyun Thaharaya

‘ज्यूं था त्यूं ठहराया’, रज्जब का है यह वचन। ओशो जब इस वचन की पर्त-दर-पर्त उघाड़ते हैं तो साथ ही साथ हमारे भी मन की कई जानी-अनजानी पर्तें स्वतः खुलती जाती हैं और हम आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि कितना कुछ हमारे मन में हम लिए बैठे हैं और कितना आसान है उसे समझना और उससे बाहर आना। इसी के साथ दस प्रवचनावों में मित्रों द्वारा उठाए गए विभिन्न सवालों के जवाब देते हुए अपनी अंतर्दृष्टि देते हैं ताकि एक दिन हम कह सकें–‘ज्यूं था त्यूं ठहराया।’

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