(ज्यों मछली बिन नीर) Jyon Machhali Bin Neer

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(ज्यों मछली बिन नीर) Jyon Machhali Bin Neer

प्रश्नोत्तर प्रवचनमाला

मेरा जोर ध्यान पर है। ध्यान का अर्थ है: स्वार्थ, परम स्वार्थ, आत्यंतिक स्वार्थ! क्योंकि ध्यान से ज्यादा निजी कोई बात नहीं है इस जगत में। ध्यान का कोई सामाजिक संदर्भ नहीं। ध्यान का अर्थ है: अपने एकांत में उतर जाना, अकेले हो जाना, मौन, शून्य, निर्विचार, निर्विकल्प। लेकिन उस निर्विचार में, उस निर्विकल्प में जहां आकाश बादलों से आच्छादित नहीं होता–अंतर-आकाश–भीतर का सूरज प्रकट होता है। सब जगमग हो जाता है। सब रोशन हो उठता है। फिर तुम्हारे भीतर प्रेम के फूल खिलते हैं, आनंद के झरने फूटते हैं, रस की धाराएं बहती हैं। फिर उलीचो, फिर बांटो। बांटना ही पड़ेगा। और उस बांटने को मैं परोपकार कहता हूं।

और जिसके जीवन में ध्यान नहीं है, वह तो दूसरे को सताएगा। सताएगा ही! अपरिहार्यरूपेण सताएगा। क्यों? क्योंकि जो खुद दुखी है, वह दुख ही बांट सकता है। और गैर-ध्यानी दुखी होगा ही, नहीं तो कोई ध्यान तलाशे क्यों? अगर बिना ध्यान के जीवन में सुख हो सकता होता, तो सुख कभी का हो गया होता। बिना ध्यान के जीवन में सुख होता नहीं। ध्यान के बिना सुख का बीज टूटता ही नहीं, अंकुरण ही नहीं होता। फूल तो लगेंगे कैसे? फल तो आएंगे कैसे? ध्यान तो सुख के बीजों को बोना है। ओशो

पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:
मन से ऊपर उठने की कला क्या है?
स्वयं के अर्थ की खोज ही स्वार्थ है?
तुम्हारे सत्य विश्वास है, अनुभूतियां नहीं
आनंद से बड़ी कोई संपदा है?
जहां प्रेम नहीं है वहां नरक है और जहां प्रेम है वहां स्वर्ग है
यौन की स्वतंत्रता या प्रेम की स्वतंत्रता?
जीवन में इतना विषाद क्यों है ?

अनुक्रम
#1: अपने-अपने कारागृह
#2: जगत सत्य बह्म सत्य
#3: अंतर्यात्रा पर निकलो
#4: ध्यान पर ही ध्यान दो
#5: सत्य की कसौटी
#6: जीवन जीने का नाम है
#7: श्रद्धा और सत्य का मिथुन
#8: प्रतिरोध न करें
#9: संन्यास: ध्यान की कसम
#10: ध्यान विधि है मूर्च्छा को तोड़ने की

उद्धरण : ज्यूं मछली बिन नीर – पहला प्रवचन : अपने अपने कारागृह
सोए लोगों की जमात ही है। तरह-तरह की नींदें हैं। अलग-अलग ढंग हैं सोए होने के। कोई धन की शराब पीकर सोया है, कोई पद की शराब पीकर सोया है। लेकिन सारी मनुष्यता सोई हुई है। जिन्हें तुम धार्मिक कहते हो वे भी धार्मिक नहीं हैं, क्योंकि बिना जागे कोई धार्मिक नहीं हो सकता है। हिंदू हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं, जैन हैं–लेकिन धार्मिक मनुष्य का कोई पता नहीं चलता। धार्मिक मनुष्य हो तो हिंदू नहीं हो सकता है, मुसलमान नहीं हो सकता है। ये सब सोए होने के ढंग हैं। कोई मस्जिद में सोया है, कोई मंदिर में सोया है।
मैं एक बड़े प्यारे आदमी को जानता था। सरल थे, अदभुत रूप से सरल थे! और आग्नेय भी थे, अग्नि की तरह दग्ध कर दें। नाम था उनका: महात्मा भगवानदीन। वे जब भी बोलते थे तो बीच-बीच में रुक जाते। कहते, बायां हाथ ऊपर करो। अब दायां हाथ ऊपर करो। अब दोनों हाथ ऊपर करो। फिर कहते, दोनों हाथ नीचे कर लो। मैंने उनसे पूछा कि यह बीच-बीच में रुक कर लोगों से कवायद क्यों करवानी? तो वे कहते, यह तो मुझे पक्का हो जाए कि लोग जागे सुन रहे हैं कि सोए हैं! और मैंने देखा कि यह सच था। जब वे कहते बाएं हाथ ऊपर करो, तो कुछ तो करते ही नहीं, कुछ दाएं कर देते।
अधिकतर लोग तो सोए ही हुए हैं–यूं भी, आंखें खोले हुए भी सोए हुए हैं। नींद का अर्थ है कि तुम्हें इस बात का पता नहीं कि तुम कौन हो। काश, तुम्हें पता हो जाए कि तुम कौन हो, तो फिर जीवन में आनंद है, फिर जीवन में एक सुवास है! क्योंकि फिर जीवन का फूल खिलता है, जीवन का सूर्य निकलता है, उत्क्रमण की यात्रा शुरू होती है।
अथर्ववेद का यह वचन प्यारा है: ‘उत्क्रामातः पुरुष मावपत्थाः माच्छित्थाः अस्माल्लोकावग्ने सूर्यस्य संदृशः।’
‘हे पुरुष, उत्क्रमण करो! उठो, ऊंचे उठो! इहलोक में ही रहते हुए सूर्य के सदृश्य तेजस्वी बनो।’ पुरुष कहते हैं, वह जो तुम्हारे भीतर बसा है। शरीर तो बस्ती है। शरीर के भीतर जो बसा है वह तुम हो। वह कौन है जो भीतर बसा है? उसका ही पता नहीं, तो और तुम्हारे जागरण का क्या अर्थ हो सकता है? अपनी ही सूझ न हो, अपना ही हाथ न सूझे, उसको हम अंधा कहेंगे। और अपनी ही आत्मा भी न सूझती हो, उसको तो महाअंधा कहना होगा। और जब तक यह अंधापन है, कैसे उत्क्रमण हो? कैसे तुम ऊंचे उठो? मूर्च्छा गर्त है, खड्ड है। जागरण पंख लगा देता है। सारा आकाश तुम्हारा है, बस दो पंख चाहिए। सारे आकाश का विस्तार तुम्हारा है। चांद-तारे तुम्हारे हैं। और तुम्हें यह जागरण की कला आ जाए तो सीढ़ी मिल गई–मंदिर की सीढ़ियां मिल गईं। अब चढ़े चलो। —ओशो

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