(जस पनिहार धरे सिर गागर) Jas Panihar Dhare Sir Gagar

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(जस पनिहार धरे सिर गागर) Jas Panihar Dhare Sir Gagar

‘धनी धरमदास की भी ऐसी ही अवस्था थी। धन था, पद था, प्रतिष्ठा थी। पंड़ित-पुरोहित घर में पूजा करते थे। अपना मंदिर था। और खूब तीर्थयात्रा करते थे। शास्त्र का वाचन चलता था, सुविधा भी बहुत, सत्संग करते थे। लेकिन जब तक कबीर से मिलन न हुआ तब तक जीवन नीरस था।

#1: गुरु मिले अगम के बासी
#2: माधव, जन्म तुम्हारे लेखे!
#3: हम सनातन के वैपारी
#4: दर पे जमी ये नजर
#5: का करत गुमान
#6: धर्म आग्नेय होता है
#7: पिया बिन नींद न आवै
#8: परमात्मा सबरंग है
#9: बिन दरसन भई बावरी
#10: तुम मेरे पास रहो खुशबू की तरह
#11: गांठ परी पिया बोले न हमसे

आदमी के जीवन की समस्या एक, समाधान भी एक। आदमी के जीवन में बहुत समस्याएं नहीं हैं और न बहुत समाधानों की जरूरत है। एक ही समस्या है कि मैं कौन हूं? और एक ही समाधान है कि इसका उत्तर मिल जाए। जीवन की सारी समस्याएं इस एक समस्या से उठती हैं। यह एक समस्या जड़ है। और इस समस्या में उलझाव भारी है। उत्तर खोजने वाले भी उत्तर नहीं खोज पाते, उलझाव में भटक जाते हैं। क्योंकि बहुत उत्तर दिए गए हैं। और बाहर से दिया गया कोई भी उत्तर काम नहीं आता। उत्तर आना चाहिए भीतर से और बाहर उत्तरों की कतार खड़ी है। और हर उत्तर तुम्हारा उत्तर बन जाने को आतुर है। हर उत्तर तुम्हें फुसला रहा है, समझा रहा है, राजी करने की कोशिश में संलग्न है–मैं हूं तुम्हारा उत्तर। और स्वभावतः जिसके भीतर समस्या खड़ी हो वह किसी भी उत्तर को पकड़ने लगता है। कहते हैं न कि डूबते को तिनके का सहारा भी बहुत मालूम होता है। हालांकि तिनकों के सहारे कोई कभी बचता नहीं। लेकिन डूबते आदमी के पास तिनका भी आ जाए तो उसी को पकड़ लेता है। ऐसे ही तुमने बहुत तिनके पकड़ लिए हैं। उन तिनकों के पकड़ने से तुम बचोगे नहीं। नाव तुम्हारे भीतर है। जहां से समस्या उठी है, वहीं समाधान छिपा है। समस्या के भीतर ही उतरना है तो समाधान मिलेगा। प्रश्न भीतर और उत्तर बाहर, अगर ऐसा होता तो सभी को उत्तर मिल गए होते। प्रश्न भी भीतर है और उत्तर भी भीतर है। इसलिए जो भीतर जाते हैं वे ही उत्तर पाते हैं। तो पहला ध्यान रखना, मैं कौन हूं, शास्त्रों से इसका उत्तर मत ले लेना अन्यथा तुम सदा को भटक जाओगे। मैं कौन हूं, इसका उत्तर स्वयं से लेना है। कोई उधार उत्तर काम न आएगा। सब उधार उत्तर झूठे हैं। इसलिए नहीं कि जिन्होंने वे उत्तर दिए थे उन्हें पता नहीं था, बल्कि इसलिए कि यह उत्तर ऐसा है कि कोई दूसरा किसी दूसरे को दे नहीं सकता। मैं जानता हूं फिर भी तुम्हें दे नहीं सकता। और दूंगा तो देने में ही झूठा हो जाएगा। तुम लोगे, लेने में ही बेईमानी हो जाएगी। यह उत्तर ऐसा है जिसकी तलाश करनी होती है। तलाश में ही निर्मित होता है। खोज में ही इसका जन्म है। —ओशो

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