(ईशावास्योपनिषद) Ishavasya Upanishad

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(ईशावास्योपनिषद) Ishavasya Upanishad

ईशावास्य उपनिषद की आधारभूत घोषणा: सब-कुछ परमात्मा का है। इसीलिए ईशावास्य नाम है–ईश्वर का है सब-कुछ। मन करता है मानने का कि हमारा है। पूरे जीवन इसी भ्रांति में हम जीते हैं। कुछ हमारा है–मालकियत, स्वामित्व–मेरा है। ईश्वर का है सब-कुछ, तो फिर मेरे मैं को खड़े होने की कोई जगह नहीं रह जाती। मैं के लिए मेरे के बुनियादी पत्थर चाहिए, अन्यथा मैं का पूरा मकान गिर जाता है। ईशावास्य की पहली घोषणा उस पूरे मकान को गिरा देने वाली है। कहता है ऋषि: सब-कुछ परमात्मा का है। मेरे का कोई उपाय नहीं। मैं भी अपने को मेरा कह सकूं, इसका भी उपाय नहीं। कहता हूं अगर, तो नाजायज। अगर कहता ही चला जाता हूं, तो विक्षिप्त। मैं भी मेरा नहीं हूं।

अनुक्रम

#1: वह पूर्ण है
#2: वह परम भोग है
#3: वह निमित्त है
#4: वह अतिक्रमण है
#5: वह समत्व है
#6: वह स्वयँभू है
#7: वह अव्याख्य है
#8: वह चैतन्य है
#9: वह ज्योतिर्मय है
#10: वह ब्रह्म है
#11: वह शून्य है
#12: असतो मा सदगमय
#13: ओम शाँति:शाँति:शाँति:

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