(हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्) Hasiba Kheliba Dhariba Dhyanam

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(हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्) Hasiba Kheliba Dhariba Dhyanam

हंसते-खेलते हुए ध्यान धरने की खेलपूर्ण कला सिखाते हैं ये पांच प्रवचन। ओशो कहते हैं कि ध्यान कोई ऊपर से आरोपित करने की बात नहीं, यह हमारा स्वभाव है। जो हमारा है और जिसे हम भूल चुके हैं, उसी की पुन: याद—रिमेंबरिंग ही ध्यान है। ओशो ने ध्यान को किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे की बपौती होने से बचाया है क्योंकि ये सही होते हुए भी सही बात कहने में सक्षम नहीं रह गए हैं। इनकी भाषा समसामयिक नहीं रही। और आज के मनुष्य के शिक्षण की व्यवस्था वैज्ञानि‍क है इसलिए एक वैज्ञानिक व्यवस्था, आधुनिकतम व्याख्या, प्रतीक भाषा, सबका समसामयिक होना आवश्यक है। इस पुस्तकक में यही तालमेल बिठाने के अपूर्व प्रयोग की चर्चा है जिससे हमें यह जानने में मदद मिलती है कि औषधि-विज्ञान, संतुलित भोजन, सम्यक निद्रा इन सबके अंतर्संबंध को जान लेने से ध्यान यानि अपने स्वभाव में आसानी से प्रविष्ट हुआ जा सकता है। विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टि से ध्यान को समझने व करने के लिए यह छोटी सी पुस्तिका बहुत सहायक होगी।

#1: मेडिसिन और मेडिटेशन
#2: ध्यान : एक वैज्ञानिक दृष्टि
#3: ध्यान : अंतस अनुभूति
#4: समर्पण के फूल
#5: मन के पार

मनुष्य एक बीमारी है। बीमारियां तो मनुष्य पर आती हैं, लेकिन मनुष्य खुद भी एक बीमारी है। मैन इज़ ए डिस-ईज़। यही उसकी तकलीफ है, यही उसकी खूबी भी। यही उसका सौभाग्य है, यही उसका दुर्भाग्य भी। जिस अर्थों में मनुष्य एक परेशानी, एक चिंता, एक तनाव, एक बीमारी, एक रोग है, उस अर्थों में पृथ्वी पर कोई दूसरा पशु नहीं है। वही रोग मनुष्य को सारा विकास दिया है। क्योंकि रोग का मतलब यह है कि हम जहां हैं, वहीं राजी नहीं हो सकते। हम जो हैं, वही होने से राजी नहीं हो सकते। वह रोग ही मनुष्य की गति बना, रेस्टलेसनेस बना। लेकिन वही उसका दुर्भाग्य भी है, क्योंकि वह बेचैन है, परेशान है, अशांत है, दुखी है, पीड़ित है। मनुष्य को छोड़ कर और कोई पशु पागल होने में समर्थ नहीं है। जब तक कि मनुष्य किसी पशु को पागल न करना चाहे, तब तक कोई पशु अपने से पागल नहीं होता, न्यूरोटिक नहीं होता। जंगल में पशु पागल नहीं होते, सर्कस में पागल हो जाते हैं। जंगल में पशु विक्षिप्त नहीं होते, अजायबघर में, ‘जू’ में विक्षिप्त हो जाते हैं! कोई पशु आत्महत्या नहीं करता, स्युसाइड नहीं करता, सिर्फ आदमी अकेला आत्महत्या कर सकता है। यह जो मनुष्य नाम का रोग है, इस रोग को सोचने, समझने, हल करने के दो उपाय किए गए हैं। एक मेडिसिन है उपाय–औषधि। और दूसरा ध्यान है उपाय–मेडिटेशन। ये दोनों एक ही रोग का इलाज हैं। इसे थोड़ा ऐसा समझना अच्छा होगा कि औषधिशास्त्र, मेडिसिन मनुष्य के रोग को एटामिक, आणविक दृष्टि से देखता है। औषधिशास्त्र मनुष्य के एक-एक रोग को अलग-अलग व्यवहार करता है। औषधिशास्त्र एक-एक रोग को आणविक मानता है। ध्यान मनुष्य को ‘ऐज़ ए होल’ बीमार मानता है, एक-एक रोग को नहीं। ध्यान मनुष्य के व्यक्तित्व को बीमार मानता है। औषधिशास्त्र मनुष्य के ऊपर बीमारियां आती हैं, विजातीय हैं, फॉरेन हैं, ऐसा मानता है। लेकिन धीरे-धीरे यह दूरी कम हुई है और धीरे-धीरे मेडिसिन ने भी कहना शुरू किया है–डोंट ट्रीट दि डिज़ीज़, ट्रीट दि पेशेंट। मत करो इलाज बीमारी का; बीमार का इलाज करो। यह बड़ी कीमती बात है। क्योंकि इसका मतलब यह है कि बीमारी भी बीमार के जीने का एक ढंग है, ए वे ऑफ लाइफ। हर आदमी एक सा बीमार नहीं हो सकता। बीमारियां भी हमारी इंडिविजुअलिटी रखती हैं, व्यक्तित्व रखती हैं। ऐसा नहीं है कि मैं क्षय रोग से, टी.बी. से बीमार पडूं और आप भी पड़ें, तो हम दोनों एक ही तरह के बीमार होंगे। हमारी टी.बी. भी दो तरह की होंगी, क्योंकि हम दो व्यक्ति हैं। और हो सकता है कि जो इलाज मेरी टी.बी. को ठीक कर सके वह आपकी टी.बी. को ठीक न कर सके। इसलिए बहुत गहरे में बीमारी नहीं है, बहुत गहरे में बीमार है।
—ओशो

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