(हरि बोलौ हरि बोल) Hari Bolo Hari Bol

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(हरि बोलौ हरि बोल) Hari Bolo Hari Bol

बोलने योग्य कुछ और है भी नहीं, न सुनने योग्य कुछ और है। बोलो तो हरि बोलो, चुप रहो तो हरि में ही चुप रहो। भीतर जाती श्वास हरि में डूबी हो, बाहर जाती श्वास हरि में डूबी हो। उठो तो हरि में, सोओ तो हरि में। जब हरि तुम्हें सब तरफ से घेर ले, जब हरि तुम्हारी परिक्रमा करे, जब तुम हरि के आवास हो जाओ… जागने में वही तुम्हारी दृष्टि में हो, स्वप्न में वही तुम्हारा स्वप्न भी बने, तुम्हारा रोआं-रोआं उसी में ओत-प्रोत हो जाए, तुम्हारे पास जगह भी न बचे जो उसके अतिरिक्त किसी और को समा ले–जब हरि ऐसा व्याप्त हो जाता है तभी मिलता है।

थोड़ी भी जगह रही हरि से गैर-भरी तो तुम संसार बना लोगे। और एक छोटी सी बूंद संसार की सागर बन जाती है। एक छोटा सा बीज, वैज्ञानिक कहते हैं, सारी पृथ्वी को हरियाली से भर सकता है। एक छोटा सा बीज, जहां तुम्हारे भीतर हरि नहीं है, पर्याप्त है तुम्हें भटकाने को–जन्मों-जन्मों तक भटकाने को। ओशो

पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:
संसार में असफलता अनिवार्य क्यों है?
मनुष्य की वस्तुतः अंतिम खोज क्या है?
क्या परमात्मा सिर्फ एक उपाय भर है सत्य तक पहुंचने के लिए?
‘प्रतीक्षा’ का क्या अर्थ होता है?
‘स्वच्छंदता’ शब्द का क्या अर्थ है?
प्रेम ‘करने’ और प्रेम में ‘होने’ का क्या अर्थ है?

अनुक्रम
#1: नीर बिनु मीन दुखी
#2: संसार अर्थात मूर्च्छा
#3: तुम सदा एकरस, राम जी, राम जी
#4: जीवन समस्या नहीं–वरदान है
#5: सुंदर सहजै चीन्हियां
#6: जो है, परमात्मा है
#7: हरि बोलौ हरि बोल
#8: पुकारो–और द्वार खुल जाएंगे
#9: सदगुरु की महिमा
#10: जागो–नाचते हुए

उद्धरण: हरि बोलौ हरि बोल – पहला प्रवचन – नीर बिनु मीन दुखी
हरि बोलौ हरि बोल !

हरि के अतिरिक्त कुछ और न बचे, ऐसी इस नई यात्रा पर सुंदरदास के साथ हम चलेंगे। संतों में… कविताएं तो बहुत संतों ने की हैं, लेकिन काव्य के हिसाब से सुंदरदास को ही केवल कवि कहा जा सकता है। बाकी के पास कुछ गाने को था, तो गाया है। लेकिन सुंदर के पास कुछ गाने को भी है और गाने की कला भी है। सुंदरदास अकेले, सारे निर्गुण संतों में, महाकवि के पद पर प्रतिष्ठित हो सकते हैं। जो कहा है वह तो अपूर्व है ही; जैसे कहा है, वह भी अपूर्व है। संदेश तो प्यारा है ही, संदेश के शब्द-शब्द भी बड़े बहुमूल्य हैं।

तुम एक महत्वपूर्ण अभियान पर निकल रहे हो। इसके पहले कि हम सुंदरदास के सूत्रों में उतरना शुरू करें… और सीढ़ी-सीढ़ी तुम्हें बड़ी गहराइयों में वे सूत्र ले जाएंगे। ठीक जल-स्रोत तक पहुंचा देंगे। पीना हो तो पी लेना। क्योंकि संत केवल प्यास जगा सकते हैं। कहावत है न, घोड़े को नदी ले जा सकते हो, घोड़े को पानी दिखा सकते हो, लेकिन पानी पिला नहीं सकते।

सुंदरदास का हाथ पकड़ो। वे तुम्हें ले चलेंगे उस सरोवर के पास, जिसकी एक घूंट भी सदा को तृप्त कर जाती है। लेकिन बस सरोवर के पास ले चलेंगे, सरोवर सामने कर देंगे। अंजुली तो तुम्हें ही बनानी पड़ेगी अपनी। झुकना तो तुम्हें ही पड़ेगा। पीना तो तुम्हें ही पड़ेगा। लेकिन अगर सुंदर को समझा तो मार्ग में वे प्यास को भी जगाते चलेंगे, तुम्हारे भीतर सोए हुए चकोर को पुकारेंगे, जो चांद को देखने लगे। तुम्हारे भीतर सोए हुए चातक को जगाएंगे, जो स्वाति की बूंद के लिए तड़फने लगे| तुम्हें समझाएंगे कि तुम मछली की भांति हो, जिसका सागर खो गया है और जो किनारे पर तड़प रही है।

सागर का तुम्हें पता हो या न हो, एक बात का तो तुम्हें पता है जिससे तुम्हें राजी होना पड़ेगा कि तुम तड़प रहे हो कि तुम परेशान हो, कि तुम पीड़ित हो, कि तुम बेचैन हो, कि तुम्हारे जीवन में कोई राहत की घड़ी नहीं है, कि तुमने जीवन में कोई सुख की किरण नहीं जानी। आशा की है। सुख मिला कब? सोचा है मिलेगा, मिलेगा, अब मिला, तब मिला; पर सदा धोखा होता रहा है। खोजा बहुत है। नहीं कि तुमने कम खोजा है–जन्मों-जन्मों से खोजा है। मगर तुम्हारे हाथ खाली हैं। तुम्हारी खोज गलत दिशाओं में चलती रही है। तुम्हारी खोज तुम्हें सरोवर के पास नहीं लाई–और-और दूर ले गई है। और धीरे-धीरे तुम्हारे अनुभव ने तुम्हारे भीतर यह बात गहरा दी है कि शायद यहां मिलने को कुछ भी नहीं है। और अगर कोई ऐसा हताश हो जाए कि यहां मिलने को कुछ भी नहीं है, तो फिर मिलने को कुछ भी नहीं है। क्योंकि पैर थक जाएंगे। तुम टूट कर गिर जाओगे।

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