(हंसा तो मोती चुगै) Hansa To Moti Chuge

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(हंसा तो मोती चुगै) Hansa To Moti Chuge

लाल’ दीवानों में दीवाने हैं। उनके जीवन की यात्रा, उनके संतत्व की गंगा बड़े अनूठे ढंग से शुरू हुई। और तो कुछ दूसरा परिचय न है, न देने की कोई जरूरत है; हो तो भी देने की कोई जरूरत नहीं है। कहां पैदा हुए, किस गांव में, किस ठांव में, किस घर-द्वार में, किन माँ-बाप से – वे सब बातें गौण है और व्यर्थ है| संतत्व कैसे पैदा हुआ, बुद्धत्व कैसे पैदा हुआ? राजस्थान में जन्मे इस गरीब युवक के जीवन में अचानक दीया कैसे जला; अमावस कैसे एक दिन पूर्णिमा हो गई – बस वही परिचय है| वही असली परिचय है?—-ओशो

पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:
ध्यान क्या है?
विद्रोह और क्रांति में क्या फर्क है?
प्रार्थना कैसे करे?
श्रद्धा क्या है?
प्रेम क्या है?
संयम का क्या अर्थ होता है?

अनुक्रम
#1: और है कोई लेनेहारा?
#2: हीर कटोरा हो गया रीता
#3: अमि तो किछु नाई
#4: साक्षी हरिद्वार है
#5: मेरा सूत्र विद्रोह
#6: विद्रोह के पंख
#7: मेरे हांसे मैं हंसूं
#8: शून्य होना सूत्र है
#9: जागरण मुक्ति है
#10: अवल गरीबी अंग बसै

उद्धरण : हंसा तो मोती चुगै – पहला प्रवचन – और है कोई लेनेहारा?

शहनाई तो सदा बजती रही है–सुनने वाले चाहिए। और इस भरी दोपहरी में भी शीतल छाया के वृक्ष हैं–खोजी चाहिए। इस उत्तप्त नगर में भी शीतल छांव है, पर शीतल छांव में शरणागत होने की क्षमता चाहिए। शीतल छांव मुफ्त नहीं मिलती। शहनाई बजती रहती है, लेकिन जब तक तुम्हारे पास सुनने का हृदय न हो, सुनाई नहीं पड़ती।

कृष्ण के ओंठों से बांसुरी कभी उतरी ही नहीं है। बांसुरी बजती ही जाती है। बांसुरी सनातन है। कभी कोई सुन लेता है तो जग जाता है; जग जाता है तो जी जाता है। जो नहीं सुन पाते, रोते ही रोते मर जाते हैं। जीते ही नहीं, बिना जीए मर जाते हैं।

श्री लालनाथ के जीवन में बड़ी अनूठी घटना से शहनाई बजी। संतों के जीवन बड़े रहस्य में शुरू होते हैं। जैसे दूर हिमालय से गंगोत्री से गंगा बहती है! छिपी है घाटियों में, पहाड़ों में, शिखरों में। वैसे ही संतों के जीवन की गंगा भी, बड़ी रहस्यपूर्ण गंगोत्रियों से शुरू होती है। आकस्मिक, अकस्मात, अचानक–जैसे अंधेरे में दीया जले कि तत्क्षण रोशनी हो जाए! धीमी-धीमी नहीं होती संतों के जीवन की यात्रा शुरू। शनैः-शनैः नहीं। संत छलांग लेते हैं। जो छलांग लेते हैं वही जान पाते हैं। जो इंच-इंच सम्हल कर चलते हैं, उनके सम्हलने में ही डूब जाते हैं। मंजिल उन्हें कभी मिलती नहीं।

मंजिल दीवानों के लिए है। मंजिल के हकदार दीवाने हैं। मंजिल के दावेदार दीवाने हैं। ‘लाल’ दीवानों में दीवाने हैं। —ओशो

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